Saturday, February 18, 2012

{ ९३ } टूटी मोहब्बत






दो घडी मयस्सर हो जाये दिलबर का हमसफ़र होना
उस घडी को ही कहते हैं सुनहरे सपनों का बसर होना।

मै तमाम दूर आ चुका हूँ मुझे साहिल से आवाज न दे
अब तो रास आने लगा है हमको बस दीदा-ए-तर होना।

तुम पर बरसती रहें तमाम महकते गुलों की ही खुश्बुयें
हर विलादत में चाहूँ मैं तेरी ही मोहब्बत का सजर होना।

तोड कर दिल मुड के भी न देखा, ये कैसा है मुकद्दर मेरा
मुसलसल जारी है इन ख्वाबों के महल का खंडहर होना।

तू नही मेरे मुकद्दर में पर मेरी मोहब्बत के साये तेरे लिये
मेरे मुकद्दर में ही लिखा है शायद बस यूँ ही दर-बदर होना।

मुझे इन हादसों ने संवार कर मेरा रंग-रूप ही बदल दिया
कब चाहा था मैने प्यार में ठुकराया हुआ सुखनवर होना।


............................................................... गोपाल कृष्ण शुक्ल



दीदा-ए-तर=भीगी आँख
विलादत=जन्म
सजर=पेड
मुसलसल=लगातार
सुखनवर=गजलकार, शायर, कवि


No comments:

Post a Comment